Tuesday, 19 June 2012

आज इस कदर द्वेष मूलक भावनाओंको पैदा किया जा रहा है ताकि यह समाज फिर अपना सर उठा कर चल न सके. इन्द्रनील खैरे जैसे लोग उसी कड़ी का हिस्सा है ! इन्हें बसपा के माध्यम से जो ट्रेनिंग दी जा रही है वही यह बहार आकर चिल्लाते है ! सही मायने में राजनीती की चौकट के यह कुत्ते कभी किसी समाज का, विचारधारा का और किसी परिवर्तनवादी महापुरुशोंका प्रतिनिधित्वा नहीं कर सकते ! हमें फिर एक बार ४० साल पहले शुरू हुए उस दौर को एक नए सिरे से सोचना होगा ! क्या हमने सही बाबासाहब और बुद्ध को लोगो के दिमाग में डाला या फिर खुद को महापुरुष और महामाया बनाने के लिए पुरे कौम को बदनाम कर आम्बेद्कारी समाज को जिल्लत भरी नजरो से देखने पर मजबूर किया ! यह प्रक्रिया आज की नहीं है ! कई सालो से यह चल रही है ! और आज इस कड़ी का अंतिम चरण आ चूका है ! अगर इस वक्त यह परिस्थितिया नहीं सुधर सकी तो आनेवाले दिन इनके जबान से आवाज भी निकालने नहीं देंगे ! सिर्फ बसपा ही नहीं बल्कि ऐसे कई संघटन है जो बाबासाहब और बुद्ध को अपमानित करने के लिए काम कर रहे है ! जिनमे प्रमुखातःसे बामसेफ, मुक्ति मोर्चा, संगोष्टी, मूलनिवासी इ. पूरी जोर शोर से आम्बेद्कारी विचारधारा को तोड़ मरोड़ करने के लिए लगे है ! विरोधियोंके हस्तक बनकर अपने ही हमें तोड़ने लगे है ! अब यह जिम्मेवारी उन लोगो की है जिन लोगो ने रिअल बाबासाहब पढ़ा है ! और आज की वास्तवता में आम्बेद्कारी विचारोंका सही इस्तमाल करना सिखा है ! (राजनीती छोड़ कर) सिर्फ और सिर्फ राजनीती के कारन इन लोगो ने कई पीढ़िया बर्बाद की है और आनेवाली पीढ़ी बर्बाद करने जा रहे है ! ऐसे दिडदमड़ी के आम्बेडकरवादियोंसे सावधान रहना और इन्हें इनकी असली पहचान दिलाना जरुरी है !

राजनितिक सत्ता की दुकानदारी

राजनितिक सत्ता की दुकानदारी और सामाजिक विचारधाराओंका मॉल इसमे बड़ा अंतर होता है ! परिवर्तनवादी विचारधाराओंको सत्ता की दुकानदारी चलाने से अच्छा है की वो अपने विचार और सिद्धांत का ऐसा व्यवहारवादी मॉल चलाये जिसमे कोई भी इन्सान अपने जीवन की सफलता प्राप्त करने का रास्ता अवगत कर सके ! सामाजिक सत्ता समतामूलक समाज के निर्मिती में सहाय्यक होती है ! बल्कि राजनितिक सत्ता अपने गंतव्य को कभी भी हासिल नहीं कर सकती ! डॉ. बाबासाहब की अवधारण सामाजिक सत्ता से है ! "शासनकर्ती जमात" की अवधारना समतामूलक समाज के निर्मिती से जुडी है ! जिसमे कोई उंच-नींच न रहे ! कोई न्याय से वंचित न रहे ! कोई अधिकार से वंचित न रहे ! व्यवस्था के केंद्र में धर्म, जात से निजात पाकर मनुष्यमात्र का विकास यह एकमात्र (प्रथम कल्याण ! मध्य कल्याण ! अंत कल्याण ) उद्देश रहे ! भारतीय संविधान के तहत इस अवधारण को अपनाया गया ! लेकिन इसे सुचारू रूप से समाज में अवगत कराने की नैतिक जिम्मेवारी जिस समूह की थी वह समूह राजनितिक सत्ता के शतरंज होने के कारन इसे सफलता नहीं मिल सकी ! आज फिर एक बार जरुरत है बाबासाहब की उस सामाजिक अवधारण को फिर एक बार गतिमान करने की ! जिस दिन यह सामाजिक अवधारण जनजन के मस्तिष्क में फैलेगी ! उस दिन सत्ता से इस समूह को कोई रोक नहीं सकता ! आज की परिस्थितियों से हमें अवगत होना पड़ेगा ! सत्ता हासिल करना बहोत कठिन नहीं ! जितना कठिन है परिवर्तनवादी बाबासाहब की सामाजिक अवधारण को समाज के व्यवहार में लाना ! हमारे बढ़ते हुए राजनितिक सत्ता के कदम रोक कर सामाजिक न्याय की गतिशील अवधारण को बाबासाहब के परिप्रेक्ष में समाज व्यवहार में लाना जरुरी है !
आओ चलो प्रण करे !
राजनितिक सत्ता नहीं सामाजिक सत्ता लाना है !
चुनाव से नहीं बल्कि विचारोंसे देश को जितना है !
---डॉ. संदीप नंदेश्वर, नागपुर. ९२२६७३४०९१