राजनितिक सत्ता की दुकानदारी और सामाजिक विचारधाराओंका मॉल इसमे बड़ा अंतर
होता है ! परिवर्तनवादी विचारधाराओंको सत्ता की दुकानदारी चलाने से अच्छा
है की वो अपने विचार और सिद्धांत का ऐसा व्यवहारवादी मॉल चलाये जिसमे कोई
भी इन्सान अपने जीवन की सफलता प्राप्त करने का रास्ता अवगत कर सके !
सामाजिक सत्ता समतामूलक समाज के निर्मिती में सहाय्यक होती है ! बल्कि
राजनितिक सत्ता अपने गंतव्य को कभी भी हासिल नहीं कर सकती ! डॉ. बाबासाहब
की अवधारण सामाजिक सत्ता से है ! "शासनकर्ती जमात" की अवधारना समतामूलक
समाज के निर्मिती से जुडी है ! जिसमे कोई उंच-नींच न रहे ! कोई न्याय से
वंचित न रहे ! कोई अधिकार से वंचित न रहे ! व्यवस्था के केंद्र में धर्म,
जात से निजात पाकर मनुष्यमात्र का विकास यह एकमात्र (प्रथम कल्याण ! मध्य
कल्याण ! अंत कल्याण ) उद्देश रहे ! भारतीय संविधान के तहत इस अवधारण को
अपनाया गया ! लेकिन इसे सुचारू रूप से समाज में अवगत कराने की नैतिक
जिम्मेवारी जिस समूह की थी वह समूह राजनितिक सत्ता के शतरंज होने के कारन
इसे सफलता नहीं मिल सकी ! आज फिर एक बार जरुरत है बाबासाहब की उस सामाजिक
अवधारण को फिर एक बार गतिमान करने की ! जिस दिन यह सामाजिक अवधारण जनजन के
मस्तिष्क में फैलेगी ! उस दिन सत्ता से इस समूह को कोई रोक नहीं सकता ! आज
की परिस्थितियों से हमें अवगत होना पड़ेगा ! सत्ता हासिल करना बहोत कठिन
नहीं ! जितना कठिन है परिवर्तनवादी बाबासाहब की सामाजिक अवधारण को समाज के
व्यवहार में लाना ! हमारे बढ़ते हुए राजनितिक सत्ता के कदम रोक कर सामाजिक
न्याय की गतिशील अवधारण को बाबासाहब के परिप्रेक्ष में समाज व्यवहार में
लाना जरुरी है !
आओ चलो प्रण करे !
राजनितिक सत्ता नहीं सामाजिक सत्ता लाना है !
चुनाव से नहीं बल्कि विचारोंसे देश को जितना है !
---डॉ. संदीप नंदेश्वर, नागपुर. ९२२६७३४०९१
आओ चलो प्रण करे !
राजनितिक सत्ता नहीं सामाजिक सत्ता लाना है !
चुनाव से नहीं बल्कि विचारोंसे देश को जितना है !
---डॉ. संदीप नंदेश्वर, नागपुर. ९२२६७३४०९१
No comments:
Post a Comment